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Delhi दिल्ली: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने ऊंचाई पर लंबे समय तक निगरानी करने वाले स्वदेशी हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम (HAPS) के विकास में बड़ी सफलता हासिल की है। हालिया फ्लाइट ट्रायल के दौरान HAPS समुद्र तल से करीब 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा। इसके बाद प्लेटफॉर्म को 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर 30 मिनट से अधिक समय तक बनाए रखा गया। परीक्षण पूरा होने के बाद सिस्टम को सुरक्षित तरीके से नीचे लाकर रिकवर किया गया। इस सफल परीक्षण को भारत की ऊंचाई आधारित निगरानी और संचार क्षमताओं के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। HAPS को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि यह बहुत अधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक हवा में रहकर निगरानी, संचार और डेटा ट्रांसमिशन जैसे काम कर सके।
परीक्षण के दौरान HAPS ने लगातार रियल-टाइम वीडियो और अन्य जरूरी डेटा ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन तक भेजा। इससे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को उड़ान के दौरान सिस्टम के प्रदर्शन की निगरानी करने और अलग-अलग तकनीकी पैरामीटर की जांच करने में मदद मिली। स्वदेशी HAPS का विकास DRDO की आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ADRDE) द्वारा किया जा रहा है। फ्लाइट ट्रायल में प्लेटफॉर्म को पहले 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक ले जाया गया। इसके बाद इसे 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थिर रखते हुए विभिन्न सिस्टम और उपकरणों की जांच की गई।
करीब 20 किलोमीटर की ऊंचाई वाला क्षेत्र पृथ्वी के सामान्य मौसम संबंधी बदलावों से काफी ऊपर होता है। ऐसे में HAPS जैसे प्लेटफॉर्म लंबे समय तक एक निर्धारित इलाके के ऊपर बने रहकर निगरानी और संचार संबंधी सेवाओं में उपयोगी साबित हो सकते हैं। ट्रायल के दौरान प्लेटफॉर्म के उड़ान नियंत्रण, डेटा ट्रांसमिशन और रिकवरी से जुड़े पहलुओं की भी जांच की गई। उड़ान समाप्त होने के बाद HAPS को नियंत्रित तरीके से नीचे लाया गया और सुरक्षित रिकवरी की गई। परीक्षण के दौरान जुटाए गए फ्लाइट डेटा का विश्लेषण भी किया गया, जिससे आगे के परीक्षण और डिजाइन में सुधार करने में मदद मिलेगी।
HAPS की खासियत यह है कि इसे पारंपरिक विमान और उपग्रह के बीच की क्षमता वाले प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया जा सकता है। यह उपग्रह की तुलना में पृथ्वी के काफी करीब रहकर काम करता है, जबकि सामान्य विमानों की तुलना में कहीं अधिक ऊंचाई पर उड़ान भर सकता है। ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी, आपदा प्रबंधन, संचार नेटवर्क, पर्यावरण निगरानी और अन्य रणनीतिक जरूरतों में किया जा सकता है। लंबे समय तक हवा में बने रहने की क्षमता विकसित होने के बाद HAPS किसी निश्चित इलाके पर लगातार नजर रखने में मददगार हो सकता है।
DRDO का यह परीक्षण फिलहाल HAPS तकनीक के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। आने वाले परीक्षणों में इसकी उड़ान अवधि, ऊंचाई पर स्थिर रहने की क्षमता और विभिन्न सिस्टम की कार्यक्षमता को और बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जा सकता है। स्वदेशी तकनीक पर आधारित HAPS का सफल परीक्षण भारत की रक्षा और एयरोस्पेस तकनीक में बढ़ती क्षमता को भी दर्शाता है। 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचना और 20 किलोमीटर पर 30 मिनट से अधिक समय तक उड़ान बनाए रखना भविष्य में लंबे समय तक हवा में रहने वाले स्वदेशी प्लेटफॉर्म के विकास के लिए अहम आधार तैयार कर सकता है।
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